सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी के नियमों की धज्जियां: रायगढ़ जिले में मानसून प्रतिबंध के बावजूद धड़ल्ले से जारी है अवैध रेत उत्खनन
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) और सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद रायगढ़ जिले में अवैध रेत उत्खनन का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। एनजीटी के नियमानुसार मानसून सत्र के दौरान यानी 15 जून से 15 अक्टूबर तक नदियों और तालाबों से किसी भी प्रकार के रेत उत्खनन पर पूर्ण प्रतिबंध रहता है। यह अवधि जलीय जीवों के प्रजनन (ब्रीडिंग सीजन) का समय होती है, जिसके संरक्षण को ध्यान में रखते हुए यह पाबंदी लगाई जाती है। लेकिन जिले के कई क्षेत्रों में इस नियम की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
विभागीय कार्रवाई नदारद, संरक्षण और पर्यावरण पर संकट
नियमों को ताक पर रखकर हो रहे इस अवैध खनन पर संबंधित विभागों की खामोशी कई बड़े सवाल खड़े करती है। जानकारों का कहना है कि विभाग द्वारा की जाने वाली कार्रवाई या तो औपचारिकता मात्र होती है या फिर लगभग न के बराबर है। जिले के कई ऐसे ग्रामीण और नदी तटीय क्षेत्र हैं, जहां लंबे समय से धड़ल्ले से रेत निकाली जा रही है, लेकिन प्रशासनिक अमला बेखबर बना हुआ है। अवैध खनन के कारण जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के साथ-साथ नदियों का प्राकृतिक स्वरूप भी खतरे में पड़ गया है।
विशेष चर्चा: क्या कहते हैं नियम, आइए जानते हैं राजेश त्रिपाठी जी से
इस पूरे गंभीर मुद्दे और एनजीटी के दिशा-निर्देशों पर विस्तार से चर्चा करने के लिए हमारे साथ जुड़े हैं राजेश त्रिपाठी। आइए उनसे जानते हैं कि इस संबंध में कानूनी प्रावधान क्या हैं और नियमों के उल्लंघन पर किस प्रकार की सख्त कार्रवाई का प्रावधान है:
“एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस बेहद स्पष्ट हैं। मानसून अवधि में जलीय जीवों के संरक्षण के लिए खनन पर पूरी तरह रोक होती है। यदि इसके बाद भी अवैध रेत उत्खनन हो रहा है, तो यह सीधे तौर पर जिला प्रशासन और खनिज विभाग की नाकामी को दर्शाता है। नियमों का पालन कराना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है, और लापरवाही बरतने वाले जिम्मेदारों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।” — राजेश त्रिपाठी
बहरहाल, बरसात के इन महीनों में पर्यावरण और जल स्रोतों को हो रहे इस नुकसान को रोकने के लिए प्रशासन को त्वरित और ठोस कदम उठाने की सख्त जरूरत है, ताकि अवैध उत्खनन पर अंकुश लगाया जा सके।












